इक उमर बीत गयी अपनी
देखो हम कितने बड़े हुए ,
'अप्पू' 'अप्पी' को बता रहा
इक पार्क बेंच पर पड़े हुए।
अपना भी एक ज़माना था
जब हम छोटे थे, बच्चे थे,
जंगल जंगल घूमा करते
छल द्वेष के खेल में कच्चे थे।
फिर दिन बदले हम व्यस्क बने
मोटे ताजे और सुस्त बने ,
इन इंसानों की स्वार्थसिद्धि को
हाथी हम दो उपयुक्त बने।
जंगल छूटा, घर भी छूटा
साथी अपने सब छूट गए,
यौवन में बंदी बने जो हम
हाथी के किस्मत फूट गए।
सर्कस और चिड़ियाघर देखे
कुछ ढेरो महानगर देखे,
दिन-रात जुल्म देख सह कर
जानवर बने कुछ नर देखे।
उनसे भागे, फिर वन पहुँचे
वहां बदला हर एक नजारा था,
जंगल खुश रहे, भरा सा हो
इंसा को यह कहाँ गवारा था।
कल-कल बहते झरने अपने
नित सूख रहे हैं डर-डर कर ,
ये दर्द कहें किसको हम सब
हम पिघल रहे हैं मर-मर कर।
यदि यूँ ही सूखता रहा पानी
तो फिर सिर्फ पत्थर ही बचेगा,
आधुनिकीकरण के इस दौर में
खुद का विनाश कभी ना दिखेगा।
अब आंसू बहने भी बंद हुए
इतना हमने अत्याचार सहा,
अपने प्यारो की मौत देख
दिल दर्द सहे यूँ कराह रहा ।
जो दो पल हम हैं साथ यहाँ
आओ मिल कर खुश हो ले हम,
अपना कुछ बचा हुआ जीवन
आओ खुशियों संग जी ले हम।
-- अमित पाण्डेय
( ये कविता मैंने SASTRA University के वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन Kuruksastra'12 में उनके हिंदी इवेंट 'उड़ान' a.k.a. Hindi Creative Writing में दिए गए चित्र पर लिखी थी, इसके लिए मुझे इवेंट का तृतीय स्थान भी प्राप्त हुआ है। )

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