‘‘फलसफ़ा ज़िंदगी का’’ . . .



जिंदगी इक सुंदर शाम की तरह है।
कभी बादलों में छिपी रिम-झिम बरस रही होती है,
कभी काली रात की आशंका से उदास होती है।
कभी डूबते सूरज के संग खिलखिला रही होती है,
कभी किसी कोने में चुपचाप अनायास रोती है।

जिंदगी आसमां में उड़ती इक पतंग है।
डोर से बंधी हुई है, किसी अपने के हाथ मे,
फिर भी हवा के साथ इठलाती रहती है।
उसके मुकद्दर में पूरा आसमां है लिखा हुआ,
पक्षियों के संग बलखाती, गुनगुनाती रहती है।

जिंदगी नीले समंदर की तरह असीमित है।
न जाने क्या कुछ अपने अंदर समाये हुए है,
हम इंसान की करतूतों से परेशान रहता है।
जुड़ी हुई हैं न जाने कितनी ज़िंदगियाँ इससे,
सो बिना शिकायत ये सब कुछ सहता है।

जिंदगी बदलते वक़्त की इक घड़ी सी है।
बहुत गुमान होता है इसे अपनी सूइयों पर,
फिर भी चाहकर कभी रुक नहीं सकती।
चलती रहती है हर पल, ताकि दुनिया भी चले,
परिस्थितियों के आगे ये कभी झुक नहीं सकती।

जिंदगी खुशनुमा है, रंगीन भी है।
इसकी खामोशियों में आने वाला कल छिपा हुआ है,
रंगों के इस इंद्रधनुष में हर रंग मिला हुआ है।
बदलते रहने की ये फितरत ये छोड़ कैसे दे,
वक़्त के बनाए मायाजाल को ये तोड़ कैसे दे।

ये जिंदगी हर घड़ी इम्तहानों से भरी हुई है,
ज़िंदा रहने के ढेरों बहानों से भरी हुई है।
निराशा के चादर अब तुम उतार के तो देखो,
ये खुशियों के गीत सुहानों से भरी हुई है।

जी लो ये जिंदगी तुम अपनों के लिए,
अपनी आँखों में बसे कुछ सपनों के लिए।
ये वक़्त ही है दवा सारे गम के लिए,
शुक्रिया ऐ खुदा, इस जीवन के लिए।
शुक्रिया ऐ खुदा, इस जीवन के लिए।।


No comments:

Post a Comment