'तुम अब बदल गए हो' . . .

तुम्हारे बारे में सोचते सोचते

खुद को ही भूल गईं हूँ मैं

अब शायद नाराज हूँ थोड़ा सा

पहले खुद से फिर तुमसे भी ।

अभी भी याद है क्या तुम्हें

कितने वादे किए थे तुम उस दिन

मुझे तो अब एक भी याद नहीं

सिर्फ 7 वादे थे दुनिया के सामने

जो चमकते हैं मेरे माथे के सिंदूर में

खनकते हैं कलाइयों की चूड़ियों में

महकते हैं मेरी हाथों की मेहंदी में

और बाँध दिये गए हैं मेरे साथ

गले में मंगलसूत्र बना कर

और उनका क्या जिनके लिए

कोई सबूत नहीं है मेरे पास

शायद गुम हो गए सब के सब

चलते समय के साथ

बढ़ते उम्र के साथ ।

यहाँ दरिया के किनारे भी

साथ साथ बैठे थे घंटो

बिना एक भी शब्द बोले

हमें बातें करने के लिए

शब्दों की जरूरत नहीं थी तब

बिना तुम्हारे कुछ बोले ही

मैं गुलाबी हो जाया करती थी

सिर्फ तुम्हें देखने भर से ।

अब तुम्हारे पास समय ही नहीं है

मेरे लिए या शायद हमारे लिए

घिरी हुई हूँ मैं आजकल

तुम्हारी उपेक्षाओं से

सिर्फ अधेरा ही बचा है

अब मेरे जीवन में ।

ये दरिया आज भी वैसा ही है

जैसा तब था सालों पहले

समय के साथ तो

सिर्फ तुम ही बदलते हो . . .

( चित्र- सुरभि झा )


आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा . . .

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा,

सुना है वहाँ सपने रखे होते हैं अपने

उन सपनों से भी कुछ जवाब करना है,
बीते समय की अधूरी हैं जो कहानियाँ
उनका भी वहाँ कुछ हिसाब करना है।

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा,

सालों से जो ख़्वाब हैं अधरों में अपने
उनका निपटारा अब सिताब करना है,
तंग होती जा रही है जो ज़िंदगी अपनी
वहाँ रात भर मस्ती बेहिसाब करना है।

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा।



( सिताब = शीघ्र, जल्दी, तुरंत )



-- अमित पाण्डेय

" कुछ क्षणिकाएं "

एक -


वक़्त के साथ नहीं बदल पता हूँ मैं
मेरी ये आदत ही मुझ पर भारी है
तुझ से क्या गिलें करूँ ऐ जिन्दगी
मेरी तो खुद से ही लड़ाई जारी है



दो -


कुछ सोचती ये जिंदगी है,
मैं बिन कहे इक शब्द सा हूँ।
भाव मेरे अब जटिल इतने,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।
अब सोचता हूँ हर घड़ी मैं,
मैं अब कहाँ किस शब्द सा हूँ?
क्यों व्यर्थ में कुछ बोलना,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।



तीन -


जिंदगी छिपी थी मुझमे ही अंदर कहीं
और मैं अनजान सारा जहां टटोलता रहा,

दूसरों को देखकर खुश हो लेता था मैं
यूं मैं ढेरों झूठी खुशियाँ बटोरता रहा।
मुझे समझ में आया नहीं कुछ भी
सो मैं दूसरों के ही पन्ने खोलता रहा,
शायद खुद से ही रूठा रहा मैं अब तक

ये ना जाने मैं क्या क्या बोलता रहा?


चार -



मुझको हाथों की लकीरों पर अब तरस आता है ,
इनके बढ़ने से पहले ही मेरी तरक्की हो जाती है ।
कुछ रहम होता है उस ऊपर वाले का मुझ पर ,
बाकी किस्मत माँ की दुआओं से पक्की ही जाती है 



-- अमित पाण्डेय

मुझे एक जादूगर की तलाश है . . .


मुझे एक जादूगर की तलाश है ,

जो मुझ गिरते हुए को संभाल सके ,
जो मेरे दिमाग में घुसकर खंगाल सके ।

जो मेरे खयालातोँ को भी पाल सके ,
जो मुझ पर लगाम एक डाल सके ।

जो मेरे दिल के साथ भी खेल सके ,
जो इतनी बुराइयों के बाद भी झेल सके ।

जो मेरे नस-नस में हुंकार भरे ,
जो मेरे सारे सपनों को साकार करे ।

जिसका मुझ पर अधिकार हो, पूरा हो ,
जो मेरे बिना आधा और अधूरा हो ।

जो मेरे कुछ कहे बिना ही सब जान ले ,
जो मेरे दुखोँ को भी अपना दुख ही मान ले ।

जिसके जादू से मेरी दुनिया बदल जाए ,
मेरे डगमगाते पैर कुछ संभल जाएँ ।

मुझे ऐसे एक जादूगर की तलाश है ,
मुझे अब एक जादूगर की तलाश है ।





लघुकथा - ' हम भी किसान ही हैं '




शहर में पढाई के बहाने २-३ साल टाइमपास करने के बाद जब राहुल जब अपने घर पंहुचा, तो वहां उसे सब कुछ नया लगने लगा, अपने खेत भी पहचान में नहीं आ रहे थे । शायद ये शहर की चमक का असर था ।
उस साल बरसात बहुत ज्यादा हुई थी, लोग दिन रात बैठ कर अपनी फसल के नुकसान का अंदाजा ही लगाते रहते थे । लेकिन राहुल पर तो इसका कोई असर नहीं पड़ना था , उसे तो बरसात मे चाय पकोड़ो का साथ ही पसंद था ।
निराश जनता रोज शाम पंडित काका के दरवाजे पर बैठ जाती और उनसे आने वाले मौसम की संभावनाएं पूछने लगती ।
ये सब सुनते सुनते राहुल तंग आ गया था , और रोज रोज की बरसात भी उसे बहुत परेशान कर रखी थी ।
एक दिन बातों ही बातों मे उसने घरवालों के सामने बोल दिया " माँ अब मैं चलता हूँ , मुझे यहाँ का मौसम ठीक नहीं लग रहा । "
इस पर माँ बोली " बेटा इतनी बरसात है , कैसे जाओगे कहीं ? "
कुछ देर सोच कर राहुल ने जवाब दिया " माँ बरसात से हमे क्या ? इतना ज्यादा बरस रहा है, किसानों की तो हालत खराब हो गयी होगी "
राहुल के पिताजी पास में ही कहीं बैठे थे , अब उनसे रहा न गया " बेटा , हम भी किसान ही हैं । "

हाथी जीवन की व्यथा कथा ...


इक उमर बीत गयी अपनी
देखो हम कितने बड़े हुए ,
'अप्पू' 'अप्पी' को बता रहा
इक पार्क बेंच पर पड़े हुए।


अपना भी एक ज़माना था
जब हम छोटे थे, बच्चे थे,
जंगल जंगल घूमा करते
छल द्वेष के खेल में कच्चे थे।


फिर दिन बदले हम व्यस्क बने
मोटे ताजे और सुस्त बने ,
इन इंसानों की स्वार्थसिद्धि को
हाथी हम दो उपयुक्त बने।


जंगल छूटा, घर भी छूटा
साथी अपने सब छूट गए,
यौवन में बंदी बने जो हम
हाथी के किस्मत फूट गए।


सर्कस और चिड़ियाघर देखे
कुछ ढेरो महानगर देखे,
दिन-रात जुल्म देख सह कर
जानवर बने कुछ नर देखे।


उनसे भागे, फिर वन पहुँचे
वहां बदला हर एक नजारा था,
जंगल खुश रहे, भरा सा हो
इंसा को यह कहाँ गवारा था।


कल-कल बहते झरने अपने
नित सूख रहे हैं डर-डर कर ,
ये दर्द कहें किसको हम सब
हम पिघल रहे हैं मर-मर कर।


यदि यूँ ही सूखता रहा पानी
तो फिर सिर्फ पत्थर ही बचेगा,
आधुनिकीकरण के इस दौर में
खुद का विनाश कभी ना दिखेगा।


अब आंसू बहने भी बंद हुए
इतना हमने अत्याचार सहा,
अपने प्यारो की मौत देख
दिल दर्द सहे यूँ कराह रहा ।


जो दो पल हम हैं साथ यहाँ
आओ मिल कर खुश हो ले हम,
अपना कुछ बचा हुआ जीवन
आओ खुशियों संग जी ले हम।





( ये कविता मैंने SASTRA University के वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन Kuruksastra'12 में उनके हिंदी इवेंट 'उड़ान' a.k.a. Hindi Creative Writing में दिए गए चित्र पर लिखी थी, इसके लिए मुझे इवेंट का तृतीय स्थान भी प्राप्त हुआ है। )