जीवन इक खुली किताब है . .
कुछ पन्ने इसके पलट गएँ
कुछ को न हाथ लगाया है
कुछ याद पुरानी बाकी है
कुछ में इतिहास समाया है
कुछ में वो बीता बचपन है
जिनकी इक अमिट निशानी है
कुछ में है लिखा हुआ छुटपन
कुछ में अनकही कहानी है
कुछ पन्ने बीती रातों से
कुछ ख्वाबों से कुछ बातों से
कुछ यूँ ही छपते चले गए
हर इक छोटी मुलाकातों से
कुछ में नासूर पुराने हैं
कुछ अपनो के भी पन्ने हैं
कुछ पन्ने भी बेगाने हैं
संघर्ष छपा कुछ पन्नो में
कुछ काले हैं बदल से हैं
कुछ कोरे पन्ने उडते हैं
कुछ पन्ने भी पागल से हैं
कुछ बांट जोहते कल के हैं
आते जाते हर पल के हैं
कुछ आशाओं से छपे हुए
आने वाले मंगल के हैं
कुछ भीग गएँ हैं आँसू से
कुछ हँसी छिपाए रखें हैं
कुछ में है धुप सुनहरी सी
सब रंग समाये रखें हैं
इन पन्नों में ही सिमट गया
अपना हर एक हिसाब है
जीवन इक खुली किताब है
जीवन इक खुली किताब है . . . . .
( २१ वीं वर्षगाँठ पर )
१२-०१-२०१२

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