एक नदी बहती है
अपेक्षाओं की
और उम्मीदों की
रोज मैं उसमें
डूबता उतरता रहता हूँ
और शिकार हो जाता हूँ
लोगों की उपेक्षाओं का ।
पास में ही कहीं
एक पुरानी हवेली है
यादों की , बातों की
एक भूलभुलैया
पागलों की तरह
रोज मैं खोजता रहता हूँ
एक सही रास्ता
वापस लौटकर आने वाला ।
पास में ही कहीं
एक कच्चा रास्ता है
मेरे उसूलों का
मेरे खुद के नियमों का
थक हार कर रोज
मैं बैठ जाता हूँ
और रोक देता हूँ
अपनी जिंदगी को ।
पास में ही कहीं
एक घना जंगल है
मेरी उलझनों का
मेरी परेशानियों का
रोज मैं उसमे कहीं
गुम हो जाता हूँ
और भटक जाता हूँ
सही रास्ते से ।
पास में ही कहीं
एक झरोखा है
रोशनी आती रहती है
वहाँ से लगातार
आशाओं की, हिम्मत की
उसी से मैं ज़िंदा हूँ अब तक
और तलाश रहा हूँ
खुद को, खुद में ही कहीं ।
-- अमित पाण्डेय

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