घड़ी की सूईयाँ चलती जा रही हैं ।
रुकना उनकी फिदरत में नहीं है ,
या शायद उनके नसीब में नहीं ,
चलते रहने में ही उनकी भलाई है ।
वरना उतार दी जाएँगी वो ,
घरों की दीवारों से ।
नदी का पानी बहता जा रहा है ।
बिना रुके , बिना कुछ पूछे ,
पूछने की इजाजत नही है उसे ,
जाकर मिल जाना है समंदर में उसको ।
वरना उबाल दिया जाएगा वो ,
सूरज की किरणों से ।
पक्षी लौट रहे हैं घरों को अपने ।
रास्ता भटकने का भी ,
समय नहीं है उनके पास ,
आज चला आना है उन्हें अपने-२ बाखर में ।
वरना निगल जाएगा ये अँधेरा उनको ।
पेड़ पत्ते ओढ़ कर खड़े रहते हैं ।
हिलते डुलते रहते हैं ,
फलते फूलते रहते हैं ,
हरकतेँ करके अपने अंदर जिंदगी दिखाते हैं ।
वरना काट जाएगा कोई ,
बेजान लकड़ी समझकर ।
सूरज पश्चिम में लाल होता जा रहा है ।
थोड़ा बहुत घटता जा रहा है ,
या फिर छिपता जा रहा है ,
रोज शाम अस्त होना भी ,
उसका एक नियम है ।
वरना बंद कर देंगे ये लोग पूजना उसको ।

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