जिंदगी चलती जा रही है . . .


घड़ी की सूईयाँ चलती जा रही हैं ।

रुकना उनकी फिदरत में नहीं है ,

या शायद उनके नसीब में नहीं ,

चलते रहने में ही उनकी भलाई है ।

वरना उतार दी जाएँगी वो ,

घरों की दीवारों से ।


नदी का पानी बहता जा रहा है ।

बिना रुके , बिना कुछ पूछे ,

पूछने की इजाजत नही है उसे ,

जाकर मिल जाना है समंदर में उसको ।

वरना उबाल दिया जाएगा वो ,

सूरज की किरणों से ।


पक्षी लौट रहे हैं घरों को अपने ।

रास्ता भटकने का भी ,

समय नहीं है उनके पास ,

आज चला आना है उन्हें अपने-२ बाखर में ।

वरना निगल जाएगा ये अँधेरा उनको ।


पेड़ पत्ते ओढ़ कर खड़े रहते हैं ।

हिलते डुलते रहते हैं ,

फलते फूलते रहते हैं ,

हरकतेँ करके अपने अंदर जिंदगी दिखाते हैं ।

वरना काट जाएगा कोई ,

बेजान लकड़ी समझकर ।


सूरज पश्चिम में लाल होता जा रहा है ।

थोड़ा बहुत घटता जा रहा है ,

या फिर छिपता जा रहा है ,

रोज शाम अस्त होना भी ,

उसका एक नियम है ।

वरना बंद कर देंगे ये लोग पूजना उसको ।


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