मेरा बचपन . . .




अब भी बचपन की शेष है कुछ धुँधली सी याद।

क्या उम्र थी वो, न कोई शिकवा न ही फरियाद ।

दिनभर गाँव में चलती हमारी चहल कूद ।
यूँ ही चलते रहते यारोँ के संग आँखे मूँद ।

वो आम की बगिया ,और पेड़ों पर झूलना ।
मुमकिन ही नहीं कभी उन दिनों को भूलना ।

चढ़ी धूप में गलियों में घूम फिर कर आना ।
फिर मजे से यारोँ के संग पोखरे में नहाना ।

न भविष्य की चिंता और न सेहत का डर ।
करते हम सब शैतानियाँ छुपा छुपा कर।

खड़ी दुपहरिया में वो क्रिकेट का खेल ।
कभी लुका छिपी तो कभी छुक छुक रेल ।

कभी चलते चलते माँ का आँचल पकड़ना ।
और छोटी छोटी बातों पर लड़ना झगडना ।

वो बेर के पेड़ , वो इमली की डाली ।
वो फूलों की क्यारी , और बागोँ का माली ।

वो दिवाली के पटाखे और होली के रंग ।
वो दशहरे का मेला , और मैं यारोँ के संग ।

अब अफसोस है मुझे , क्यों हम बड़े हो गए । 
इस जिंदगी की दौड़ में , क्यों हम खड़े हो गए ।

ओ ऊपरवाले , गर फुरसत हो तो एक काम करना ।
अगले भी जनम में कुछ ऐसा ही बचपन मेरे नाम करना ।



( मेरे उन सभी बचपन के मित्रों को समर्पित )