क्या उम्र थी वो, न कोई शिकवा न ही फरियाद ।
दिनभर गाँव में चलती हमारी चहल कूद ।
यूँ ही चलते रहते यारोँ के संग आँखे मूँद ।
वो आम की बगिया ,और पेड़ों पर झूलना ।
मुमकिन ही नहीं कभी उन दिनों को भूलना ।
चढ़ी धूप में गलियों में घूम फिर कर आना ।
फिर मजे से यारोँ के संग पोखरे में नहाना ।
न भविष्य की चिंता और न सेहत का डर ।
करते हम सब शैतानियाँ छुपा छुपा कर।
खड़ी दुपहरिया में वो क्रिकेट का खेल ।
कभी लुका छिपी तो कभी छुक छुक रेल ।
कभी चलते चलते माँ का आँचल पकड़ना ।
और छोटी छोटी बातों पर लड़ना झगडना ।
वो बेर के पेड़ , वो इमली की डाली ।
वो फूलों की क्यारी , और बागोँ का माली ।
वो दिवाली के पटाखे और होली के रंग ।
वो दशहरे का मेला , और मैं यारोँ के संग ।
अब अफसोस है मुझे , क्यों हम बड़े हो गए ।
इस जिंदगी की दौड़ में , क्यों हम खड़े हो गए ।
ओ ऊपरवाले , गर फुरसत हो तो एक काम करना ।
अगले भी जनम में कुछ ऐसा ही बचपन मेरे नाम करना ।
( मेरे उन सभी बचपन के मित्रों को समर्पित )

