वहाँ सपनों का एक बाज़ार लगा हुआ था,
हर दुकान के सामने कुछ सपने टंगे थे,
सपने सब रंग के, सपने हर एक ढंग के,
कुछ गरीबों से सपने, कुछ पैसों में रंगे थे।
कुछ बेडौल बेरंग सपने, कुछ काले उजियारे,
कुछ मस्ती में पागल, कुछ सपने थे न्यारे,
कुछ उड़ते थे सपने मानो मदमस्त होकर,
कुछ चुपचाप बैठे थे किसी दुकां में किनारे।
मैं अपनी ही धुन में कुछ आगे बढ़ गया,
और हाट की सबसे छोटी टाल पर चढ़ गया,
वो भी ग्राहक समझ सपने दिखाने लग गया,
एक एक सपने की बारीकी बताने लग गया।
लीजिये, ये कुछ सपने हैं जो आपके सहारे हैं,
कुछ पुराने सपने हैं जो माँ-बाबू के सँवारे हैं,
कुछ खुशमिजाज़ सपने हर वक़्त मुसकुराते हैं,
और ये हैं कुछ बेचारे समय के बड़े मारे हैं।
बताइये आज अभी किस सपने का श्रीगणेश करूँ,
आपकी खिदमत में क्या सपना मैं पेश करूँ,
मैंने बड़े गौर से दुकान के सारे सपनों को देखा,
लगा सोचने अभी यहाँ किस सपने का आदेश करूँ।
मैं राह वापसी में ही कुछ सपने यूं लेता जाऊंगा,
जो सपने सच्चे दिखते हों, सपने अनकहे अधूरे हों,
जो सपने अक्सर रोते हों, सपने जो हर पल सोते हों,
सपने जिनका कोई और न हो, जो सपने आधे-पूरे हों।
सपने लेकर मैं लौट लिया सपनों की अद्भुत दुनिया से,
हर सपना मुझको प्यारा है, प्यारी है सपनों की दुनिया,
बस अब यही तमन्ना है सपनों की दुनिया लाने की,
सपने मेरे सब अपने हैं अब जिद है उनको पाने की।
हाँ, कल रात मैं एक अनोखे शहर से गुजरा।
-- अमित पाण्डेय
