“तरणताल में कदमताल” - हास्य कविता

(स्विमिंग को लेकर जिंदगी का पहला अनुभव, लेकिन सीखने की लालसा अभी भी है :D)

पुराने दिन भी क्या अजीब होते थे,
भरपेट खाकर घोड़े बेच कर सोते थे,
मेरी जिंदगी चल रही पूरी मस्त थी,
जब तक ना आयी पिछली अगस्त थी।

एक दिन बैठे बैठे ही ये फरमान आया,
हमें सताने का उन्हे जो अरमान आया,
सुबह तड़के स्विमिंग पूल को जाना था,
स्विमिंग के बहाने हाजिरी लगवाना था।

अगली सुबह 6 बजे जब हम आँखें खोले,
डरकर घबराकर न जाने क्या क्या बोले,
सुबह सुबह नींद में हम चले जा रहे थे,
हर कदम गिर गिरकर संभले जा रहे थे।

स्विमिंग पूल पहुँच कर शांत जल को देखा,
दिमाग में बैठा रहे थे पूल की रूप-रेखा,
सर्द हवाओं के साथ मौसम बड़ा नम था,
मैंने खोज निकाला पानी जहाँ कुछ कम था।

ट्रेनर इंसान जैसा दिखने में कुछ जरूर था,
लेकिन पानी में वो मगरमच्छ जैसा क्रूर था,
सीटी की आवाज के साथ लोग बढ़े जा रहे थे,
मानो देश सीमा पर दुश्मन से लड़े जा रहे थे।

हम भी ठिठुरते हुए पानी के किनारे आए,
साथ जो दोस्त थे चारउनके सहारे आए,
मैंने पानी को हाथ लगाकर टटोलना चाहा,
अपने अंदर के डर को सबसे बोलना चाहा।

लेकिन दोस्तों ने हाथ पकड़ मुझे खींच लिया,
और मैंने खुद को कुछ इस तरह सींच लिया,
तैरना आसान तो था नहीं ये मैं जानता था,
अपने निकम्मेपन को ढंग से पहचानता था।

सो किनारे रस्सा पकड़कर ही दो डुबकी लगाई,
स्विमिंग पूल में एक्टिंग कर ये आफत छुड़ाई,
लेकिन गज़ब तो तब हुआ जब हम सुस्ता रहे,
किसी किनारे सुरक्षा की पड़ताल कर पुख्ता रहे।

हाफ पैंट में फ़र्स्ट इयर का एक बच्चा आया,
जैसे मेरे सामने कोई उमर का कच्चा आया,
अंजाने में वो मेरे दिल पर ये वार कर गया,
बंदा तैर कर ही स्विमिंग पूल पार कर गया।

हम वहाँ गंगा माँ का जयकारा लगाते रह गए,
अपने अंदर का डर सरेआम जगाते रह गए,
लौटने के टाइम तक दिल मेरा बेहाल रहा,
तैर ना पाने का उसे कुछ यूं मलाल रहा।

अफसोस के आँसुओं से पूरा पूल भरना पड़ा,
कंबखत तैरने की जगह कदमताल करना पड़ा,
फिर चन्द डुबकियाँ लगा घर को वापसी थी,
तैरने से मेरी ये दुश्मनी अब कुछ आपसी थी।

बित्ते भर के बच्चे पूल को पार कर जाते,
मेरे जैसे के दिलों का कुछ शिकार कर जाते,
उस दिन से आज तलक पूल की राह न किया,
अपने तैराकी कला का कभी परवाह न किया।

हम तो पूरे थलचर हैं और ऐसे ही बड़े अच्छे हैं,
पानी मे कभी खेलने जाएँ हम वो नहीं बच्चे हैं,
स्विमिंग पूल में नहीं बनवाना है अपना स्मारक,
भईया आप की तैराकी बस आपको ही मुबारक।

हास्य कविता लिखने का पहला प्रयास :D


" मेरी पहली चवन्नी "


फ़ेसबूक के मेरे पिछले 25 स्टेटस अपडेट-


१.               तुम्हारा घर मेरे शहर की उस आखिरी गली में हैं
               
जहाँ कभी मेरे अरमानों की एक दुकान हुआ करती थी।



२.       आसमां साफ है और इनायत बरस रही है,
               
मुझसे अरसे से रूठा चाँद अभी आज दिखा है।


३.       दिन तो ज़माने के साथ यूं ही चलता बीत जाता है,
              
कमबखत रात बाद में अकेले कहीं सिसक रही होती है।

४.       मेरे पास खुशियों की एक पुरानी चवन्नी पड़ी है,
             
आओ दो-दो आने आपस में बाँट के खुश हो जाएँ।


५.       अलमारी के किसी एक कोने में, एक पोटली खुशियाँ रखी हैं,
              
ढूंढकर थोड़ी तुम खुद ले लो, और थोड़ी बिखेर दो मेरे आँगन में। 


६.       मेरे लिए उनके बोल भी बहुत महंगे हैं आजकल,
              
जिनके लिए हम खुद को सस्ते में बेचा करते थे ।


७.       तुझे पाना तमाम ख़्वाहिशों मे से एक ख़्वाहिश जरूर है,
              
लेकिन इक तेरे लिए मैं अपना वजूद न मिटाऊंगा अब।


८.       कल रात के कुछ सपने सिरहाने संभाल के रखे हैं,
              
सुना है हर रात फ़रिश्ते वहीं पास में काट देते हैं।


९.       तंग-हाल है ये जिंदगी कुछ इस कदर,
              
जल्दी से ढेरों खुशियाँ कमाना चाहता हूँ।
              
दूर कहीं जो क्षितिज दिख रहा होता है,
              
आजकल उसे दौड़ के पाना चाहता हूँ।


१०.      अंधेरे कमरे में जो भरी हैं पिछली यादें
              अब कहाँ उन लम्हों की कोई तलाफ़ी है,
              जिंदगी रंगीन और खुशनुमा है आजकल
              
खुदके खुश होने को ये बहाना काफी है।
              ~
तलाफ़ी = क्षति-पूर्ति


११.      आजकल एक नया शौक चढ़ रहा है मुझे,
              
किसी की भी शकले-सूरत पढ़ने लगता हूँ।
              
इसी शौक ने मुझे घंटो आईना दिखाया है,
              
खुद को देखकर कुछ सपने गढ़ने लगता हूँ।


१२.      फ़रिश्ते भी नहीं जानते की मेरा मुकद्दर क्या है,
              
यहाँ रोज ही मेरे सितारे कुछ बदल जाते हैं।


१३.      गलतियाँ करना मेरा पेशा है,
              
रोज कुछ न कुछ कमा लेता हूँ।


१४.      हम तो कलेंडर पर आँखें गड़ाए बैठे हैं,
              
तारीखें तो खुद बख़ुद बदलती जा रही हैं।


१५.      पिछली गलियों में जाने में डर लगता है,
              
वहाँ छुटपन की कुछ यादों का डेरा है।


१६.      तुम्हारे खिलाफ सोचे मेरे हर शब्द बेकार जाते हैं,
             
तुमसे लड़ने मे तो हम खुद से ही हार जाते हैं।


१७.      जीवन एक फोटो एल्बम है,
             
कहीं तुम मुस्कुरा रहे हो
             
कहीं हम मुस्कुरा रहे हैं।


१८.      पास से ही कहीं 
             
एक नदी बहती है 
             
अपेक्षाओं की 
             
और उम्मीदों की 
             
रोज मैं उसमें 
               
डूबता उतरता रहता हूँ 
             
और शिकार हो जाता हूँ 
             
लोगों की उपेक्षाओं का।


१९.      कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी,
              
जैसे खुद से ही चल रहा युद्ध हो,
              
अपने ही अंदर सब कुछ अशुद्ध हो।
              
खुशियों का मार्ग अब अवरुद्ध हो,
              
सारी दुनिया ही अब मेरे विरुद्ध हो।


२०.      जिंदगी छिपी थी मुझमे ही अंदर कहीं
              
और मैं अनजान सारा जहां टटोलता रहा
              
दूसरों को देखकर खुश हो लेता था मैं
             
यूं मैं ढेरों झूठी खुशियाँ बटोरता रहा। 
              
मुझे समझ में आया नहीं कुछ भी
              
सो मैं दूसरों के ही पन्ने खोलता रहा,
              
शायद खुद से ही रूठा रहा मैं अब तक 
              
ये ना जाने मैं क्या क्या बोलता रहा?


२१.      कुछ सोचती ये जिंदगी है,
              
मैं बिन कहे इक शब्द सा हूँ। 
              
भाव मेरे अब जटिल इतने,
              
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ। 
             
अब सोचता हूँ हर घड़ी मैं,
              
मैं अब कहाँ किस शब्द सा हूँ?
              
क्यों व्यर्थ में कुछ बोलना,
              
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।


२२.      मुझको हाथों की लकीरों पर अब तरस आता है ,
              
इनके बढ़ने से पहले ही मेरी तरक्की हो जाती है। 
              
कुछ रहम होता है उस ऊपर वाले का मुझ पर
             
बाकी किस्मत माँ की दुआओं से पक्की ही जाती है।


२३.      वक़्त के साथ नहीं बदल पता हूँ मैं 
              
मेरी ये आदत ही मुझ पर भारी है 
              
तुझ से क्या गिलें करूँ ऐ जिन्दगी 
              
मेरी तो खुद से ही लड़ाई जारी है।


२४.      छोड़ कर अपनी दरख़्त निकला ही क्यूँ मैं ,
              
बात अब तक समझ न आई है|
              
मुद्दतो टिक नहीं पाया कहीं मैं ,
             
हर मौसम आशियाना बदलता रहता हूँ|


२५.      हर शाम मेरी खिड़की से मेरे घर जाने वाली ट्रेन गुजरती है,
              
छुक छुक करती कुछ याद दिलाती एक ट्रेन गुजरती है।


          --  अमित पाण्डेय

‘‘फलसफ़ा ज़िंदगी का’’ . . .



जिंदगी इक सुंदर शाम की तरह है।
कभी बादलों में छिपी रिम-झिम बरस रही होती है,
कभी काली रात की आशंका से उदास होती है।
कभी डूबते सूरज के संग खिलखिला रही होती है,
कभी किसी कोने में चुपचाप अनायास रोती है।

जिंदगी आसमां में उड़ती इक पतंग है।
डोर से बंधी हुई है, किसी अपने के हाथ मे,
फिर भी हवा के साथ इठलाती रहती है।
उसके मुकद्दर में पूरा आसमां है लिखा हुआ,
पक्षियों के संग बलखाती, गुनगुनाती रहती है।

जिंदगी नीले समंदर की तरह असीमित है।
न जाने क्या कुछ अपने अंदर समाये हुए है,
हम इंसान की करतूतों से परेशान रहता है।
जुड़ी हुई हैं न जाने कितनी ज़िंदगियाँ इससे,
सो बिना शिकायत ये सब कुछ सहता है।

जिंदगी बदलते वक़्त की इक घड़ी सी है।
बहुत गुमान होता है इसे अपनी सूइयों पर,
फिर भी चाहकर कभी रुक नहीं सकती।
चलती रहती है हर पल, ताकि दुनिया भी चले,
परिस्थितियों के आगे ये कभी झुक नहीं सकती।

जिंदगी खुशनुमा है, रंगीन भी है।
इसकी खामोशियों में आने वाला कल छिपा हुआ है,
रंगों के इस इंद्रधनुष में हर रंग मिला हुआ है।
बदलते रहने की ये फितरत ये छोड़ कैसे दे,
वक़्त के बनाए मायाजाल को ये तोड़ कैसे दे।

ये जिंदगी हर घड़ी इम्तहानों से भरी हुई है,
ज़िंदा रहने के ढेरों बहानों से भरी हुई है।
निराशा के चादर अब तुम उतार के तो देखो,
ये खुशियों के गीत सुहानों से भरी हुई है।

जी लो ये जिंदगी तुम अपनों के लिए,
अपनी आँखों में बसे कुछ सपनों के लिए।
ये वक़्त ही है दवा सारे गम के लिए,
शुक्रिया ऐ खुदा, इस जीवन के लिए।
शुक्रिया ऐ खुदा, इस जीवन के लिए।।


'तुम अब बदल गए हो' . . .

तुम्हारे बारे में सोचते सोचते

खुद को ही भूल गईं हूँ मैं

अब शायद नाराज हूँ थोड़ा सा

पहले खुद से फिर तुमसे भी ।

अभी भी याद है क्या तुम्हें

कितने वादे किए थे तुम उस दिन

मुझे तो अब एक भी याद नहीं

सिर्फ 7 वादे थे दुनिया के सामने

जो चमकते हैं मेरे माथे के सिंदूर में

खनकते हैं कलाइयों की चूड़ियों में

महकते हैं मेरी हाथों की मेहंदी में

और बाँध दिये गए हैं मेरे साथ

गले में मंगलसूत्र बना कर

और उनका क्या जिनके लिए

कोई सबूत नहीं है मेरे पास

शायद गुम हो गए सब के सब

चलते समय के साथ

बढ़ते उम्र के साथ ।

यहाँ दरिया के किनारे भी

साथ साथ बैठे थे घंटो

बिना एक भी शब्द बोले

हमें बातें करने के लिए

शब्दों की जरूरत नहीं थी तब

बिना तुम्हारे कुछ बोले ही

मैं गुलाबी हो जाया करती थी

सिर्फ तुम्हें देखने भर से ।

अब तुम्हारे पास समय ही नहीं है

मेरे लिए या शायद हमारे लिए

घिरी हुई हूँ मैं आजकल

तुम्हारी उपेक्षाओं से

सिर्फ अधेरा ही बचा है

अब मेरे जीवन में ।

ये दरिया आज भी वैसा ही है

जैसा तब था सालों पहले

समय के साथ तो

सिर्फ तुम ही बदलते हो . . .

( चित्र- सुरभि झा )


आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा . . .

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा,

सुना है वहाँ सपने रखे होते हैं अपने

उन सपनों से भी कुछ जवाब करना है,
बीते समय की अधूरी हैं जो कहानियाँ
उनका भी वहाँ कुछ हिसाब करना है।

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा,

सालों से जो ख़्वाब हैं अधरों में अपने
उनका निपटारा अब सिताब करना है,
तंग होती जा रही है जो ज़िंदगी अपनी
वहाँ रात भर मस्ती बेहिसाब करना है।

आज रात मैं चाँद पर जाऊंगा।



( सिताब = शीघ्र, जल्दी, तुरंत )



-- अमित पाण्डेय

" कुछ क्षणिकाएं "

एक -


वक़्त के साथ नहीं बदल पता हूँ मैं
मेरी ये आदत ही मुझ पर भारी है
तुझ से क्या गिलें करूँ ऐ जिन्दगी
मेरी तो खुद से ही लड़ाई जारी है



दो -


कुछ सोचती ये जिंदगी है,
मैं बिन कहे इक शब्द सा हूँ।
भाव मेरे अब जटिल इतने,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।
अब सोचता हूँ हर घड़ी मैं,
मैं अब कहाँ किस शब्द सा हूँ?
क्यों व्यर्थ में कुछ बोलना,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।



तीन -


जिंदगी छिपी थी मुझमे ही अंदर कहीं
और मैं अनजान सारा जहां टटोलता रहा,

दूसरों को देखकर खुश हो लेता था मैं
यूं मैं ढेरों झूठी खुशियाँ बटोरता रहा।
मुझे समझ में आया नहीं कुछ भी
सो मैं दूसरों के ही पन्ने खोलता रहा,
शायद खुद से ही रूठा रहा मैं अब तक

ये ना जाने मैं क्या क्या बोलता रहा?


चार -



मुझको हाथों की लकीरों पर अब तरस आता है ,
इनके बढ़ने से पहले ही मेरी तरक्की हो जाती है ।
कुछ रहम होता है उस ऊपर वाले का मुझ पर ,
बाकी किस्मत माँ की दुआओं से पक्की ही जाती है 



-- अमित पाण्डेय

मुझे एक जादूगर की तलाश है . . .


मुझे एक जादूगर की तलाश है ,

जो मुझ गिरते हुए को संभाल सके ,
जो मेरे दिमाग में घुसकर खंगाल सके ।

जो मेरे खयालातोँ को भी पाल सके ,
जो मुझ पर लगाम एक डाल सके ।

जो मेरे दिल के साथ भी खेल सके ,
जो इतनी बुराइयों के बाद भी झेल सके ।

जो मेरे नस-नस में हुंकार भरे ,
जो मेरे सारे सपनों को साकार करे ।

जिसका मुझ पर अधिकार हो, पूरा हो ,
जो मेरे बिना आधा और अधूरा हो ।

जो मेरे कुछ कहे बिना ही सब जान ले ,
जो मेरे दुखोँ को भी अपना दुख ही मान ले ।

जिसके जादू से मेरी दुनिया बदल जाए ,
मेरे डगमगाते पैर कुछ संभल जाएँ ।

मुझे ऐसे एक जादूगर की तलाश है ,
मुझे अब एक जादूगर की तलाश है ।





लघुकथा - ' हम भी किसान ही हैं '




शहर में पढाई के बहाने २-३ साल टाइमपास करने के बाद जब राहुल जब अपने घर पंहुचा, तो वहां उसे सब कुछ नया लगने लगा, अपने खेत भी पहचान में नहीं आ रहे थे । शायद ये शहर की चमक का असर था ।
उस साल बरसात बहुत ज्यादा हुई थी, लोग दिन रात बैठ कर अपनी फसल के नुकसान का अंदाजा ही लगाते रहते थे । लेकिन राहुल पर तो इसका कोई असर नहीं पड़ना था , उसे तो बरसात मे चाय पकोड़ो का साथ ही पसंद था ।
निराश जनता रोज शाम पंडित काका के दरवाजे पर बैठ जाती और उनसे आने वाले मौसम की संभावनाएं पूछने लगती ।
ये सब सुनते सुनते राहुल तंग आ गया था , और रोज रोज की बरसात भी उसे बहुत परेशान कर रखी थी ।
एक दिन बातों ही बातों मे उसने घरवालों के सामने बोल दिया " माँ अब मैं चलता हूँ , मुझे यहाँ का मौसम ठीक नहीं लग रहा । "
इस पर माँ बोली " बेटा इतनी बरसात है , कैसे जाओगे कहीं ? "
कुछ देर सोच कर राहुल ने जवाब दिया " माँ बरसात से हमे क्या ? इतना ज्यादा बरस रहा है, किसानों की तो हालत खराब हो गयी होगी "
राहुल के पिताजी पास में ही कहीं बैठे थे , अब उनसे रहा न गया " बेटा , हम भी किसान ही हैं । "

हाथी जीवन की व्यथा कथा ...


इक उमर बीत गयी अपनी
देखो हम कितने बड़े हुए ,
'अप्पू' 'अप्पी' को बता रहा
इक पार्क बेंच पर पड़े हुए।


अपना भी एक ज़माना था
जब हम छोटे थे, बच्चे थे,
जंगल जंगल घूमा करते
छल द्वेष के खेल में कच्चे थे।


फिर दिन बदले हम व्यस्क बने
मोटे ताजे और सुस्त बने ,
इन इंसानों की स्वार्थसिद्धि को
हाथी हम दो उपयुक्त बने।


जंगल छूटा, घर भी छूटा
साथी अपने सब छूट गए,
यौवन में बंदी बने जो हम
हाथी के किस्मत फूट गए।


सर्कस और चिड़ियाघर देखे
कुछ ढेरो महानगर देखे,
दिन-रात जुल्म देख सह कर
जानवर बने कुछ नर देखे।


उनसे भागे, फिर वन पहुँचे
वहां बदला हर एक नजारा था,
जंगल खुश रहे, भरा सा हो
इंसा को यह कहाँ गवारा था।


कल-कल बहते झरने अपने
नित सूख रहे हैं डर-डर कर ,
ये दर्द कहें किसको हम सब
हम पिघल रहे हैं मर-मर कर।


यदि यूँ ही सूखता रहा पानी
तो फिर सिर्फ पत्थर ही बचेगा,
आधुनिकीकरण के इस दौर में
खुद का विनाश कभी ना दिखेगा।


अब आंसू बहने भी बंद हुए
इतना हमने अत्याचार सहा,
अपने प्यारो की मौत देख
दिल दर्द सहे यूँ कराह रहा ।


जो दो पल हम हैं साथ यहाँ
आओ मिल कर खुश हो ले हम,
अपना कुछ बचा हुआ जीवन
आओ खुशियों संग जी ले हम।





( ये कविता मैंने SASTRA University के वार्षिक सांस्कृतिक आयोजन Kuruksastra'12 में उनके हिंदी इवेंट 'उड़ान' a.k.a. Hindi Creative Writing में दिए गए चित्र पर लिखी थी, इसके लिए मुझे इवेंट का तृतीय स्थान भी प्राप्त हुआ है। )