कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी


कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी,


जैसे कल का कोई बीता ख्वाब हो,

धूप मे मुरझाया एक गुलाब हो।

जैसे पुराना कोई बाकी हिसाब हो,

सालों पुरानी कोई अधूरी किताब हो। 


कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी,


जैसे खुद से ही चल रहा युद्ध हो,

अपने ही अंदर सब कुछ अशुद्ध हो।

खुशियों का मार्ग अब अवरुद्ध हो,

सारी दुनिया ही अब मेरे विरुद्ध हो।


कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी,


जैसे दुश्मनों की इक ये तरकीब हो,

या बदल जाना ही सबका नसीब हो।

जैसे सब कुछ ही आज अजीब हो,

ऊपर वाला भी अब कुछ गरीब हो।


 कुछ यूं बीती जा रही है ये ज़िंदगी,


बदलते रास्ते बहुत हैं ज़िंदगी मे अपने,

अब आगे मुझको भी बदल जाना चाहिए।

राह अपनी भी सही मंजिल को जाती है,

लड़खड़ा के अब कुछ संभल जाना चाहिए।


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