" एक उम्मीद "


मैं बंद रखता हूँ मेरी खिड़की 


नहीं चाहता कि उस पार से ,

कोई देखे और मुझ पर 

अपना समय बरबाद करे ।


नहीं चाहता कि कोई रोशनी 

खिड़की पार कर 

मेरे शरीर तक पहुँच सके ।


अब खुली हवा में साँस लेने की

आदत नहीं रही मेरी 

नहीं चाहता कि हवा का कोई 

झोका मुझे छू पाए ।


अपने आप से भी अभी 

पूरी नहीं हुई लड़ाई मेरी ,

नहीं चाहता कि अब मैं

दूसरों को भी नज़र आऊँ ।


आकर कभी बैठा करते थे 

परिँदे मेरी खिड़की पर ,

बहुत चुभती थी उनकी 

सुरीली आवाज भी मुझे,

अब मुझे देखकर उन्होंने भी

आना छोड़ दिया है ।


सूखे बंजर पर होती बरसात से भी

दुख होता है मुझे ,

नहीं चाहता कि कोई बूँद

अपना रास्ता भटक जाए ,

और गलती से अंदर आ जाए ।


मुझे डर है कि बाहर का

कोई अंदर आकर ,

मुझको या मेरे घर को ,

बदल कर न चला जाए।


सो मैं बंद रखता हूँ मेरी खिड़की ।


मुझमें अब इतनी हिम्मत नहीं

कि सदियों से बंद इस खिड़की को 

मैं खोल सकूँ ,

अब ये मेरे लिए एक 

परम्परा और नसीब बन गई है ।


उम्मीद है मुझे उस एक दिन की ,

जब मेरे अंदर का 'खामोश अँधेरा' ,

तोड़ कर रख देगा ये खिड़की मेरी ।



( समर्पित उन सभी लोगों को जिन्होंने कभी मेरी खिड़की खोलने का प्रयास किया है )


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