शहर में पढाई के बहाने २-३ साल टाइमपास करने के बाद जब राहुल जब अपने घर पंहुचा, तो वहां उसे सब कुछ नया लगने लगा, अपने खेत भी पहचान में नहीं आ रहे थे । शायद ये शहर की चमक का असर था ।
उस साल बरसात बहुत ज्यादा हुई थी, लोग दिन रात बैठ कर अपनी फसल के नुकसान का अंदाजा ही लगाते रहते थे । लेकिन राहुल पर तो इसका कोई असर नहीं पड़ना था , उसे तो बरसात मे चाय पकोड़ो का साथ ही पसंद था ।
निराश जनता रोज शाम पंडित काका के दरवाजे पर बैठ जाती और उनसे आने वाले मौसम की संभावनाएं पूछने लगती ।
ये सब सुनते सुनते राहुल तंग आ गया था , और रोज रोज की बरसात भी उसे बहुत परेशान कर रखी थी ।
एक दिन बातों ही बातों मे उसने घरवालों के सामने बोल दिया " माँ अब मैं चलता हूँ , मुझे यहाँ का मौसम ठीक नहीं लग रहा । "
इस पर माँ बोली " बेटा इतनी बरसात है , कैसे जाओगे कहीं ? "
कुछ देर सोच कर राहुल ने जवाब दिया " माँ बरसात से हमे क्या ? इतना ज्यादा बरस रहा है, किसानों की तो हालत खराब हो गयी होगी "
राहुल के पिताजी पास में ही कहीं बैठे थे , अब उनसे रहा न गया " बेटा , हम भी किसान ही हैं । "
राहुल के पिताजी पास में ही कहीं बैठे थे , अब उनसे रहा न गया " बेटा , हम भी किसान ही हैं । "
-- अमित पाण्डेय
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