एक -वक़्त के साथ नहीं बदल पता हूँ मैं
मेरी ये आदत ही मुझ पर भारी है
तुझ से क्या गिलें करूँ ऐ जिन्दगी
मेरी तो खुद से ही लड़ाई जारी है
दो -
कुछ सोचती ये जिंदगी है,
मैं बिन कहे इक शब्द सा हूँ।
भाव मेरे अब जटिल इतने,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।
अब सोचता हूँ हर घड़ी मैं,
मैं अब कहाँ किस शब्द सा हूँ?
क्यों व्यर्थ में कुछ बोलना,
मैं आज कुछ निःशब्द सा हूँ।
तीन -
जिंदगी छिपी थी मुझमे ही अंदर कहीं
और मैं अनजान सारा जहां टटोलता रहा,
दूसरों को देखकर खुश हो लेता था मैं
यूं मैं ढेरों झूठी खुशियाँ बटोरता रहा।
मुझे समझ में आया नहीं कुछ भी
सो मैं दूसरों के ही पन्ने खोलता रहा,
शायद खुद से ही रूठा रहा मैं अब तक
ये ना जाने मैं क्या क्या बोलता रहा?
चार -
मुझको हाथों की लकीरों पर अब तरस आता है ,
इनके बढ़ने से पहले ही मेरी तरक्की हो जाती है ।
कुछ रहम होता है उस ऊपर वाले का मुझ पर ,
बाकी किस्मत माँ की दुआओं से पक्की ही जाती है ।
-- अमित पाण्डेय
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